रहेउ एक दिन अवधि अधारा
रहेउ एक दिन अवधि अधारा
चौपाई १, दोहा १ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
रहेउ एक दिन अवधि अधारा। समुझत मन दुख भयउ अपारा॥ कारन कवन नाथ नहिं आयउ। जानि कुटिल किधौं मोहि बिसरायउ॥ १ ॥
अर्थ
प्राणों के आधाररूप अवधि का एक ही दिन शेष रह गया। यह सोचते ही भरतजी के मन में अपार दुःख हुआ। क्या कारण हुआ कि नाथ नहीं आये? प्रभु ने कुटिल जानकर मुझे कहीं भुला तो नहीं दिया?
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “भरत विरह, हनुमान आगमन” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत के विरह, हनुमान के शुभ आगमन और अयोध्या में हर्ष का वर्णन है।
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भरत विरह, हनुमान आगमन