सासु ससुर सन मोरि हुँति बिनय
सासु ससुर सन मोरि हुँति बिनय
दोहा ९८ · अयोध्याकाण्ड
दोहा पाठ
सासु ससुर सन मोरि हुँति बिनय करबि परि पायँ॥ मोर सोचु जनि करिअ कछु मैं बन सुखी सुभायँ॥ ९८ ॥
अर्थ
अतः सास और ससुर के पाँव पड़कर, मेरी ओर से विनती कीजियेगा कि वे मेरा कुछ भी सोच न करें; मैं वन में स्वभाव से ही सुखी हूँ।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी” प्रकरण का दोहा ९८ है। इस प्रकरण में लक्ष्मण-निषाद संवाद, सीता-राम से विदा लेकर सुमंत्र के भारी मन से अयोध्या लौटने का वर्णन है।
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लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी