बोले लखन मधुर मृदु बानी

चौपाई २, दोहा ९२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

बोले लखन मधुर मृदु बानी। ग्यान बिराग भगति रस सानी॥ काहु न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत करम भोग सबु भ्राता॥ २ ॥

अर्थ

तब लक्ष्मणजी ज्ञान, वैराग्य और भक्ति के रस से सनी हुई मीठी और कोमल वाणी बोले-- हे भाई! कोई किसी को सुख-दुःख का देनेवाला नहीं है। सब अपने ही किये हुए कर्मों का फल भोगते हैं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ९२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मण-निषाद संवाद, सीता-राम से विदा लेकर सुमंत्र के भारी मन से अयोध्या लौटने का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी