ते सिय रामु साथरीं सोए

चौपाई २, दोहा ९१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

ते सिय रामु साथरीं सोए। श्रमित बसन बिनु जाहिं न जोए॥ मातु पिता परिजन पुरबासी। सखा सुसील दास अरु दासी॥ २ ॥

अर्थ

वही श्रीसीता और श्रीरामजी आज घास-फूस की साथरी पर थके हुए बिना वस्त्र के ही सोये हैं। ऐसी दशा में वे देखे नहीं जाते। माता, पिता, कुटुम्बी, पुरवासी (प्रजा), मित्र, अच्छे शील-स्वभाव के दास और दासियाँ--।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ९१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मण-निषाद संवाद, सीता-राम से विदा लेकर सुमंत्र के भारी मन से अयोध्या लौटने का वर्णन है।

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लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी