सासु ससुर गुर प्रिय परिवारू
सासु ससुर गुर प्रिय परिवारू
चौपाई २, दोहा ९७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सासु ससुर गुर प्रिय परिवारू। फिरहु त सब कर मिटै खभारू॥ सुनि पति बचन कहति बैदेही। सुनहु प्रानपति परम सनेही॥ २ ॥
अर्थ
उन्होंने कहा—यदि तुम घर लौट जाओ, तो सास, ससुर, गुरु, प्रियजन एवं कुटुम्बी सबकी चिन्ता मिट जाय। पति के वचन सुनकर जानकीजी कहती हैं—हे प्राणपति! हे परम स्नेही! सुनिये।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ९७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मण-निषाद संवाद, सीता-राम से विदा लेकर सुमंत्र के भारी मन से अयोध्या लौटने का वर्णन है।
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लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी