भूपति भवन सुभायँ सुहावा

चौपाई ४, दोहा ९० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

भूपति भवन सुभायँ सुहावा। सुरपति सदनु न पटतर पावा॥ मनिमय रचित चारु चौबारे। जनु रतिपति निज हाथ सँवारे॥ ४ ॥

अर्थ

महाराज दशरथजी का महल तो स्वभाव से ही सुन्दर है, इन्द्रभवन भी जिसकी समानता नहीं पा सकता। उसमें सुन्दर मणियों के रचे चौबारे (छत के ऊपर बँगले) हैं, जिन्हें मानो रति के पति कामदेव ने अपने ही हाथों सजाकर बनाया है;।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ९० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मण-निषाद संवाद, सीता-राम से विदा लेकर सुमंत्र के भारी मन से अयोध्या लौटने का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी