धरमु न दूसर सत्य समाना

चौपाई ३, दोहा ९५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

धरमु न दूसर सत्य समाना। आगम निगम पुरान बखाना॥ मैं सोइ धरमु सुलभ करि पावा। तजें तिहूँ पुर अपजसु छावा॥ ३ ॥

अर्थ

वेद, शास्त्र और पुराणों में कहा गया है कि सत्य के समान दूसरा धर्म नहीं है। मैंने उस धर्म को सहज ही पा लिया है। इस [सत्यरूपी धर्म] का त्याग करने से तीनों लोकों में अपयश छा जायगा।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ९५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मण-निषाद संवाद, सीता-राम से विदा लेकर सुमंत्र के भारी मन से अयोध्या लौटने का वर्णन है।

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लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी