तुम्ह पुनि पितु सम अति हित
तुम्ह पुनि पितु सम अति हित
चौपाई १, दोहा ९६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
तुम्ह पुनि पितु सम अति हित मोरें। बिनती करउँ तात कर जोरें॥ सब बिधि सोइ करतब्य तुम्हारें। दुख न पाव पितु सोच हमारें॥ १ ॥
अर्थ
आप भी पिता के समान ही मेरे बड़े हितैषी हैं। हे तात! मैं हाथ जोड़कर आपसे विनती करता हूँ कि आपका भी सब प्रकार से वही कर्तव्य है जिसमें पिताजी हम लोगों के सोच में दुःख न पावें।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ९६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मण-निषाद संवाद, सीता-राम से विदा लेकर सुमंत्र के भारी मन से अयोध्या लौटने का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी