तात कृपा करि कीजिअ सोई

चौपाई १, दोहा ९५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

तात कृपा करि कीजिअ सोई। जातें अवध अनाथ न होई॥ मंत्रिहि राम उठाइ प्रबोधा। तात धरम मतु तुम्ह सबु सोधा॥ १ ॥

अर्थ

[और कहा--] हे तात! कृपा करके वही कीजिए जिससे अयोध्या अनाथ न हो। श्रीरामजी ने मंत्री को उठाकर धैर्य बँधाते हुए समझाया कि हे तात! आपने तो धर्म के सभी सिद्धान्तों को छान डाला है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ९५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मण-निषाद संवाद, सीता-राम से विदा लेकर सुमंत्र के भारी मन से अयोध्या लौटने का वर्णन है।

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लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी