बिबिध बसन उपधान तुराईं
बिबिध बसन उपधान तुराईं
चौपाई १, दोहा ९१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
बिबिध बसन उपधान तुराईं। छीर फेन मृदु बिसद सुहाईं॥ तहँ सिय रामु सयन निसि करहीं। निज छबि रति मनोज मदु हरहीं॥ १ ॥
अर्थ
जहाँ [ओढ़ने-बिछाने के] अनेकों वस्त्र, तकिये और गद्दे हैं, जो दूध के फेन के समान कोमल, निर्मल (उज्वल) और सुन्दर हैं; वहाँ (उन चौबारों में) श्रीसीताजी और श्रीरामचन्द्रजी रात को सोया करते थे और अपनी शोभा से रति और कामदेव के गर्व को हरण करते थे।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ९१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मण-निषाद संवाद, सीता-राम से विदा लेकर सुमंत्र के भारी मन से अयोध्या लौटने का वर्णन है।
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लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी