मेटि जाइ नहिं राम रजाई

चौपाई ४, दोहा ९९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

मेटि जाइ नहिं राम रजाई। कठिन करमगति कछु न बसाई॥ राम लखन सिय पद सिरु नाई। फिरेउ बनिक जिमि मूर गवाँई॥ ४ ॥

अर्थ

श्रीरामजी की आज्ञा मेटी नहीं जा सकती। कर्म की गति कठिन है, उस पर कुछ भी वश नहीं चलता। श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी के चरणों में सिर नवाकर सुमन्त्र इस तरह लौटे जैसे कोई व्यापारी अपना मूलधन (पूँजी) गँवाकर लौटे।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ९९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मण-निषाद संवाद, सीता-राम से विदा लेकर सुमंत्र के भारी मन से अयोध्या लौटने का वर्णन है।

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लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी