अस बिचारि नहिं कीजिअ रोसू
अस बिचारि नहिं कीजिअ रोसू
चौपाई १, दोहा ९३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
अस बिचारि नहिं कीजिअ रोसू। काहुहि बादि न देइअ दोसू॥ मोह निसाँ सबु सोवनिहारा। देखिअ सपन अनेक प्रकारा॥ १ ॥
अर्थ
ऐसा विचारकर क्रोध नहीं करना चाहिए और न किसी को व्यर्थ दोष ही देना चाहिए। सब लोग मोहरूपी रात्रि में सोनेवाले हैं और सोते हुए उन्हें अनेक प्रकार के स्वप्न दिखाई देते हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ९३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मण-निषाद संवाद, सीता-राम से विदा लेकर सुमंत्र के भारी मन से अयोध्या लौटने का वर्णन है।
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लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी