सखा समुझि अस परिहरि मोहू
सखा समुझि अस परिहरि मोहू
चौपाई १, दोहा ९४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सखा समुझि अस परिहरि मोहू। सिय रघुबीर चरन रत होहू॥ कहत राम गुन भा भिनुसारा। जागे जग मंगल सुखदारा॥ १ ॥
अर्थ
हे सखा! ऐसा समझ, मोह को त्यागकर श्रीसीतारामजी के चरणों में प्रेम करो। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी के गुण कहते-कहते सबेरा हो गया! तब जगत् का मंगल करनेवाले और उसे सुख देनेवाले श्रीरामजी जागे।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ९४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मण-निषाद संवाद, सीता-राम से विदा लेकर सुमंत्र के भारी मन से अयोध्या लौटने का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी