संभावित कहुँ अपजस लाहू
संभावित कहुँ अपजस लाहू
चौपाई ४, दोहा ९५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
संभावित कहुँ अपजस लाहू। मरन कोटि सम दारुन दाहू॥ तुम्ह सन तात बहुत का कहऊँ। दिएँ उतरु फिरि पातकु लहऊँ॥ ४ ॥
अर्थ
प्रतिष्ठित पुरुष के लिये अपयश की प्राप्ति करोड़ों मृत्यु के समान भीषण संताप देनेवाली है। हे तात! मैं आपसे अधिक क्या कहूँ! लौटकर उत्तर देने में भी पाप का भागी होता हूँ।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ९५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मण-निषाद संवाद, सीता-राम से विदा लेकर सुमंत्र के भारी मन से अयोध्या लौटने का वर्णन है।
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लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी