आरति बस सनमुख भइउँ बिलगु न
आरति बस सनमुख भइउँ बिलगु न
दोहा ९७ · अयोध्याकाण्ड
दोहा पाठ
आरति बस सनमुख भइउँ बिलगु न मानब तात। आरजसुत पद कमल बिनु बादि जहाँ लगि नात॥ ९७ ॥
अर्थ
किन्तु हे तात! मैं आर्त होकर ही आपके सम्मुख हुई हूँ, आप बुरा न मानियेगा। आर्यसुत पद कमल के बिना जगत् में जहाँ तक नाते हैं सभी मेरे लिये व्यर्थ हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी” प्रकरण का दोहा ९७ है। इस प्रकरण में लक्ष्मण-निषाद संवाद, सीता-राम से विदा लेकर सुमंत्र के भारी मन से अयोध्या लौटने का वर्णन है।
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लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी