पितु बैभव बिलास मैं डीठा

चौपाई १, दोहा ९८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

पितु बैभव बिलास मैं डीठा। नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा॥ सुखनिधान अस पितु गृह मोरें। पिय बिहीन मन भाव न भोरें॥ १ ॥

अर्थ

मैंने पिताजी के ऐश्वर्य की छटा देखी है, जिनके चरण रखने की चौकी से सर्वशिरोमणि राजाओं के मुकुट मिलते हैं (अर्थात बड़े-बड़े राजा जिनके चरणों में प्रणाम करते हैं)। ऐसे पिताजी का घर, जो सब प्रकार के सुखों का भण्डार है, पति के बिना मेरे मन को भूलकर भी नहीं भाता।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ९८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मण-निषाद संवाद, सीता-राम से विदा लेकर सुमंत्र के भारी मन से अयोध्या लौटने का वर्णन है।

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लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी