उठे लखनु प्रभु सोवत जानी

चौपाई १, दोहा ९० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

उठे लखनु प्रभु सोवत जानी। कहि सचिवहि सोवन मृदु बानी॥ कछुक दूरि सजि बान सरासन। जागन लगे बैठि बीरासन॥ १ ॥

अर्थ

फिर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को सोते जानकर लक्ष्मणजी उठे और कोमल वाणी से मन्त्री सुमन्त्रजी को सोने के लिये कहकर वहाँ से कुछ दूर पर धनुष-बाण से सजकर, वीरासन से बैठकर जागने (पहरा देने) लगे।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ९० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मण-निषाद संवाद, सीता-राम से विदा लेकर सुमंत्र के भारी मन से अयोध्या लौटने का वर्णन है।

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लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी