सोवत प्रभुहि निहारि निषादू
सोवत प्रभुहि निहारि निषादू
चौपाई ३, दोहा ९० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सोवत प्रभुहि निहारि निषादू। भयउ प्रेम बस हृदयँ बिषादू॥ तनु पुलकित जलु लोचन बहई। बचन सप्रेम लखन सन कहई॥ ३ ॥
अर्थ
प्रभु को जमीन पर सोते देखकर प्रेमवश निषादराज के हृदय में विषाद हो आया। उसका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रों से [प्रेमाश्रुओं का] जल बहने लगा। वह प्रेमसहित लक्ष्मणजी से वचन कहने लगा--।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ९० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मण-निषाद संवाद, सीता-राम से विदा लेकर सुमंत्र के भारी मन से अयोध्या लौटने का वर्णन है।
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लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी