पतिहि प्रेममय बिनय सुनाई

चौपाई ४, दोहा ९७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

पतिहि प्रेममय बिनय सुनाई। कहति सचिव सन गिरा सुहाई॥ तुम्ह पितु ससुर सरिस हितकारी। उतरु देउँ फिरि अनुचित भारी॥ ४ ॥

अर्थ

इस प्रकार पति को प्रेममयी विनती सुनाकर सीताजी मन्त्री से सुहावनी वाणी कहने लगीं—आप मेरे पिताजी और ससुरजी के समान मेरा हित करनेवाले हैं। आपको मैं बदले में उत्तर देती हूँ, यह बहुत ही अनुचित है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ९७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मण-निषाद संवाद, सीता-राम से विदा लेकर सुमंत्र के भारी मन से अयोध्या लौटने का वर्णन है।

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लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी