भइ दिनकर कुल बिटप कुठारी
भइ दिनकर कुल बिटप कुठारी
चौपाई १, दोहा ९२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
भइ दिनकर कुल बिटप कुठारी। कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी॥ भयउ बिषादु निषादहि भारी। राम सीय महि सयन निहारी॥ १ ॥
अर्थ
वह सूर्यकुलरूपी वृक्ष के लिये कुल्हाड़ी हो गयी। उस कुबुद्धि ने सम्पूर्ण विश्व को दुःखी कर दिया। श्रीराम-सीता को जमीन पर सोते हुए देखकर निषाद को बड़ा दुःख हुआ।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ९२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मण-निषाद संवाद, सीता-राम से विदा लेकर सुमंत्र के भारी मन से अयोध्या लौटने का वर्णन है।
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लक्ष्मण-निषाद संवाद, सुमंत्र की वापसी