जे चरन सिव अज पूज्य रज
छन्द ४, दोहा १३ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
छन्द पाठ
जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनिपतिनी तरी। नख निर्गता मुनि बंदिता त्रैलोक पावनि सुरसरी॥ ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंटक किन लहे। पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेस नित्य भजामहे॥ ४ ॥
अर्थ
जो चरण शिवजी और ब्रह्माजी के द्वारा पूज्य हैं, तथा जिन चरणों की कल्याणमयी रज का स्पर्श पाकर [शिला बनी हुई] गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या तर गयी; जिन चरणों के नख से मुनियों द्वारा वन्दित, त्रैलोक्य को पवित्र करने वाली सुरसरिता गंगा निकलीं और ध्वजा, वज्र, अंकुश और कमल, इन चिह्नों से युक्त जिन चरणों में वन में फिरते समय काँटे लगने से चिह्न पड़ गये हैं; हे मुकुन्द! हे राम! हे रमेश! हम आपके उन्हीं दोनों चरणकमलों को नित्य भजते रहते हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “राम राज्याभिषेक और स्तुति” प्रकरण का छन्द ४, दोहा १३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम के दिव्य राज्याभिषेक और वेद तथा शिवजी द्वारा प्रभु की स्तुति का वर्णन है।