जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं
जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं
चौपाई २, दोहा १५ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं। सुख संपति नाना बिधि पावहिं॥ सुर दुर्लभ सुख करि जग माहीं। अंतकाल रघुपति पुर जाहीं॥ २ ॥
अर्थ
और जो मनुष्य सकाम भाव से सुनते और जो गाते हैं, वे अनेक प्रकार के सुख और सम्पत्ति पाते हैं। वे जगत् में देवदुर्लभ सुखों को भोगकर अन्तकाल में श्रीरघुनाथजी के परमधाम को जाते हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “राम राज्याभिषेक और स्तुति” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम के दिव्य राज्याभिषेक और वेद तथा शिवजी द्वारा प्रभु की स्तुति का वर्णन है।
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राम राज्याभिषेक और स्तुति