बिप्रन्ह दान बिबिधि बिधि दीन्हे
बिप्रन्ह दान बिबिधि बिधि दीन्हे
चौपाई ४, दोहा १२ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
बिप्रन्ह दान बिबिधि बिधि दीन्हे। जाचक सकल अजाचक कीन्हे॥ सिंघासन पर त्रिभुअन साईं। देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाईं॥ ४ ॥
अर्थ
उन्होंने ब्राह्मणों को अनेकों प्रकार के दान दिये और सम्पूर्ण याचकों को अयाचक बना दिया (मालामाल कर दिया)। त्रिभुवन के स्वामी श्रीरामचन्द्रजी को सिंहासन पर देखकर देवताओं ने नगाड़े बजाये।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “राम राज्याभिषेक और स्तुति” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम के दिव्य राज्याभिषेक और वेद तथा शिवजी द्वारा प्रभु की स्तुति का वर्णन है।
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राम राज्याभिषेक और स्तुति