अति दीन मलीन दुखी नितहीं
अति दीन मलीन दुखी नितहीं
छन्द ६, दोहा १४ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
छन्द पाठ
अति दीन मलीन दुखी नितहीं। जिन्ह कें पद पंकज प्रीति नहीं॥ अवलंब भवंत कथा जिन्ह कें। प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें॥ ६ ॥
अर्थ
जिन्हें आपके चरणकमलों में प्रीति नहीं है वे नित्य ही अत्यन्त दीन, मलिन और दुःखी रहते हैं। और जिन्हें आपकी कथा का आधार है, उनको संत और भगवान् सदा प्रिय लगते हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “राम राज्याभिषेक और स्तुति” प्रकरण का छन्द ६, दोहा १४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम के दिव्य राज्याभिषेक और वेद तथा शिवजी द्वारा प्रभु की स्तुति का वर्णन है।
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राम राज्याभिषेक और स्तुति