वानरों की और निषाद की विदाई

श्रीरामजी प्रेम, आदर और उपहारों सहित अपने सहायकों को विदा करते हैं। वानर और निषाद प्रभु से बिछुड़ते समय गहन स्नेह और कृतज्ञता प्रकट करते हैं।

उत्तरकाण्ड · प्रकरण ५ / २१

प्रकरण पाठ

चौपाई

बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं। जिमि परद्रोह संत मन माहीं॥ तब रघुपति सब सखा बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिरु नाए॥ १ ॥

अर्थ:

उन लोगों को अपने घर भूल ही गये। [जाग्रत की तो बात ही क्या] उन्हें स्वप्न में भी घर की सुध (याद) नहीं आती, जैसे संतों के मन में दूसरों से द्रोह करने की बात कभी नहीं आती। तब श्रीरघुनाथजी ने सब सखाओं को बुलाया। सब ने आकर आदरसहित सिर नवाया।

चौपाई

परम प्रीति समीप बैठारे। भगत सुखद मृदु बचन उचारे॥ तुम्ह अति कीन्हि मोरि सेवकाई। मुख पर केहि बिधि करौं बड़ाई॥ २ ॥

अर्थ:

बड़े ही प्रेम से श्रीरामजी ने उनको अपने पास बैठाया और भक्तों को सुख देनेवाले कोमल वचन कहे—तुम लोगों ने मेरी बड़ी सेवा की है। मुँह पर किस प्रकार तुम्हारी बड़ाई करूँ?

चौपाई

ताते मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे। मम हित लागि भवन सुख त्यागे॥ अनुज राज संपति बैदेही। देह गेह परिवार सनेही॥ ३ ॥

अर्थ:

मेरे हित के लिये तुम लोगों ने घरों को तथा सब प्रकार के सुखों को त्याग दिया। इससे तुम मुझे अत्यन्त ही प्रिय लग रहे हो। छोटे भाई, राज्य, सम्पत्ति, जानकी, देह, गेह, परिवार, स्नेहीजन—

चौपाई

सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना। मृषा न कहउँ मोर यह बाना॥ सब कें प्रिय सेवक यह नीती। मोरें अधिक दास पर प्रीती॥ ४ ॥

अर्थ:

ये सभी मुझे प्रिय हैं, परंतु तुम्हारे समान नहीं। मैं झूठ नहीं कहता, यह मेरा स्वभाव है। सेवक सभी को प्यारे लगते हैं, यह नीति (नियम) है। [पर] मेरा तो दास पर [स्वाभाविक ही] विशेष प्रेम है।

दोहा

अब गृह जाहु सखा सब भजेहु मोहि दृढ़ नेम। सदा सर्बगत सर्बहित जानि करेहु अति प्रेम॥ १६ ॥

अर्थ:

हे सखागण! अब सब लोग घर जाओ; वहाँ दृढ़ नियम से मुझे भजते रहना। मुझे सदा सर्वगत और सबका हित करनेवाला जानकर अत्यन्त प्रेम करना।

दोहा 17 के अंतर्गत
चौपाई

सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। को हम कहाँ बिसरि तन गए॥ एकटक रहे जोरि कर आगे। सकहिं न कछु कहि अति अनुरागे॥ १ ॥

अर्थ:

प्रभु के वचन सुनकर सब-के-सब प्रेममग्न हो गये। हम कौन हैं और कहाँ हैं? यह देह की सुध भी भूल गयी। वे प्रभु के सामने हाथ जोड़कर टकटकी लगाये देखते ही रह गये। अत्यन्त प्रेम के कारण कुछ कह नहीं सकते।

चौपाई

परम प्रेम तिन्ह कर प्रभु देखा। कहा बिबिधि बिधि ग्यान बिसेषा॥ प्रभु सन्मुख कछु कहन न पारहिं। पुनि पुनि चरन सरोज निहारहिं॥ २ ॥

अर्थ:

प्रभु ने उनका अत्यन्त प्रेम देखा, [तब] उन्हें अनेकों प्रकार से विशेष ज्ञान का उपदेश दिया। प्रभु के सम्मुख वे कुछ कह नहीं सकते। बार-बार प्रभु के चरणकमलों को देखते हैं।

चौपाई

तब प्रभु भूषन बसन मगाए। नाना रंग अनूप सुहाए॥ सुग्रीवहि प्रथमहिं पहिराए। बसन भरत निज हाथ बनाए॥ ३ ॥

अर्थ:

तब प्रभु ने अनेक रंगों के अनुपम और सुन्दर भूषण-वस्त्र मँगवाये। सबसे पहले सुग्रीव को पहनाये। वस्त्र भरत ने अपने हाथ से बनाए।

चौपाई

प्रभु प्रेरित लछिमन पहिराए। लंकापति रघुपति मन भाए॥ अंगद बैठ रहा नहिं डोला। प्रीति देखि प्रभु ताहि न बोला॥ ४ ॥

अर्थ:

फिर प्रभु की प्रेरणा से लक्ष्मणजी ने लंकापति को गहने-कपड़े पहनाये, जो श्रीरघुनाथजी के मन को बहुत ही अच्छे लगे। अंगद बैठे ही रहे, वे अपनी जगह से हिलते तक नहीं। उनका उत्कट प्रेम देखकर प्रभु ने उनको नहीं बुलाया।

दोहा

जामवंत नीलादि सब पहिराए रघुनाथ। हियँ धरि राम रूप सब चले नाइ पद माथ॥ १७ (क) ॥

अर्थ:

जाम्बवान् और नील आदि सबको श्रीरघुनाथजी ने स्वयं भूषण-वस्त्र पहनाये। वे सब अपने हृदयों में श्रीरामचन्द्रजी के रूप को धारण करके उनके चरणों में मस्तक नवाकर चले।

दोहा

तब अंगद उठि नाइ सिरु सजल नयन कर जोरि। अति बिनीत बोलेउ बचन मनहुँ प्रेम रस बोरि॥ १७ (ख) ॥

अर्थ:

तब अंगद उठकर सिर नवाकर, नेत्रों में जल भरकर और हाथ जोड़कर अत्यन्त विनम्र तथा मानो प्रेम के रस में डुबोये हुए (मधुर) वचन बोले।

दोहा 18 के अंतर्गत
चौपाई

सुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो। दीन दयाकर आरत बंधो॥ मरती बेर नाथ मोहि बाली। गयउ तुम्हारेहि कोंछें घाली॥ १ ॥

अर्थ:

हे सर्वज्ञ! हे कृपा और सुख के समुद्र! हे दीन दयाकर! हे आर्तों के बन्धु! सुनिये। हे नाथ! मरते समय मेरा पिता बालि मुझे आपकी ही गोद में डाल गया था।

चौपाई

असरन सरन बिरदु संभारी। मोहि जनि तजहु भगत हितकारी॥ मोरें तुम्ह प्रभु गुर पितु माता। जाउँ कहाँ तजि पद जलजाता॥ २ ॥

अर्थ:

अशरण-शरण विरद याद करके मुझे त्यागिये नहीं। मेरे तो तुम प्रभु, गुरु, पितु, माता, सब कुछ आप ही हैं। आपके चरणकमलों को छोड़कर मैं कहाँ जाऊँ?।

चौपाई

तुम्हहि बिचारि कहहु नरनाहा। प्रभु तजि भवन काज मम काहा॥ बालक ग्यान बुद्धि बल हीना। राखहु सरन नाथ जन दीना॥ ३ ॥

अर्थ:

हे महाराज! आप ही विचारकर कहिये, प्रभु को छोड़कर घर में मेरा क्या काम है? हे नाथ! इस ज्ञान, बुद्धि और बल से हीन बालक तथा दीन सेवक को शरण में रखिये।

चौपाई

नीचि टहल गृह कै सब करिहउँ। पद पंकज बिलोकि भव तरिहउँ॥ अस कहि चरन परेउ प्रभु पाही। अब जनि नाथ कहहु गृह जाही॥ ४ ॥

अर्थ:

मैं घर की सब नीची-से-नीची सेवा करूँगा और आपके चरणकमलों को देख-देखकर भवसागर से तर जाऊँगा। ऐसा कहकर वे प्रभु के चरणों में गिर पड़े और बोले—हे नाथ! अब यह न कहिये कि तू घर जा।

दोहा

अंगद बचन बिनीत सुनि रघुपति करुना सींव। प्रभु उठाइ उर लायउ सजल नयन राजीव॥ १८ (क) ॥

अर्थ:

अंगद के विनम्र वचन सुनकर करुणा की सीमा प्रभु श्रीरघुनाथजी ने उनको उठाकर हृदय से लगा लिया। प्रभु के नेत्रकमलों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भर आया।

दोहा

निज उर माल बसन मनि बालितनय पहिराइ। बिदा कीन्हि भगवान तब बहु प्रकार समुझाइ॥ १८ (ख) ॥

अर्थ:

तब भगवान ने अपने हृदय की माला, वस्त्र और मणि बालि-पुत्र अंगद को पहनाकर और बहुत प्रकार से समझाकर उनकी विदाई की।

दोहा 19 के अंतर्गत
चौपाई

भरत अनुज सौमित्रि समेता। पठवन चले भगत कृत चेता॥ अंगद हृदयँ प्रेम नहिं थोरा। फिरि फिरि चितव राम कीं ओरा॥ १ ॥

अर्थ:

भरत और छोटे भाई सौमित्रि (लक्ष्मणजी) सहित, भक्त की करनी को याद करके उनको पहुँचाने चले। अंगद के हृदय में थोड़ा प्रेम नहीं है (अर्थात् बहुत अधिक प्रेम है)। वे फिर-फिर कर श्रीरामजी की ओर देखते हैं।

चौपाई

बार बार कर दंड प्रनामा। मन अस रहन कहहिं मोहि रामा॥ राम बिलोकनि बोलनि चलनी। सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी॥ २ ॥

अर्थ:

और बार-बार दण्डवत् प्रणाम करते हैं। मन में ऐसा आता है कि श्रीरामजी मुझे रहने को कह दें। वे श्रीरामजी के देखने की, बोलने की, चलने की तथा हँसकर मिलने की रीति को याद कर-करके सोचते हैं (दुखी होते हैं)।

चौपाई

प्रभु रुख देखि बिनय बहु भाषी। चलेउ हृदयँ पद पंकज राखी॥ अति आदर सब कपि पहुँचाए। भाइन्ह सहित भरत पुनि आए॥ ३ ॥

अर्थ:

किन्तु प्रभु का रुख देखकर, बहुत-से विनयवचन कहकर तथा हृदय में चरणकमलों को रखकर वे चले। अत्यन्त आदर के साथ सब वानरों को पहुँचाकर भाइयों सहित भरतजी लौट आये।

चौपाई

तब सुग्रीव चरन गहि नाना। भाँति बिनय कीन्हे हनुमाना॥ दिन दस करि रघुपति पद सेवा। पुनि तव चरन देखिहउँ देवा॥ ४ ॥

अर्थ:

तब हनुमानजी ने सुग्रीव के चरण पकड़कर अनेक प्रकार से विनती की और कहा—हे देव! दस दिन श्रीरघुनाथजी की चरण-सेवा करके फिर मैं आकर आपके चरणों के दर्शन करूँगा।

चौपाई

पुन्य पुंज तुम्ह पवनकुमारा। सेवहु जाइ कृपा आगारा॥ अस कहि कपि सब चले तुरंता। अंगद कहइ सुनहु हनुमंता॥ ५ ॥

अर्थ:

हे पवनकुमार! तुम पुण्य की राशि हो। जाकर कृपाधाम श्रीरामजी की सेवा करो। सब वानर ऐसा कहकर तुरंत चल पड़े। अंगद ने कहा—हे हनुमान्! सुनो—

दोहा

कहेहु दंडवत प्रभु सैं तुम्हहि कहउँ कर जोरि। बार बार रघुनायकहि सुरति कराएहु मोरि॥ १९ (क) ॥

अर्थ:

मैं तुमसे हाथ जोड़कर कहता हूँ, प्रभु से मेरी दण्डवत् कहना और श्रीरघुनाथजी को बार-बार मेरी याद कराते रहना।

दोहा

अस कहि चलेउ बालिसुत फिरि आयउ हनुमंत। तासु प्रीति प्रभु सन कही मगन भए भगवंत॥ १९ (ख) ॥

अर्थ:

ऐसा कहकर बालिसुत अंगद चले, तब हनुमानजी लौट आये और आकर प्रभु से उनका प्रेम वर्णन किया। उसे सुनकर भगवान् प्रेममग्न हो गये।

दोहा

कुलिसहु चाहि कठोर अति कोमल कुसुमहु चाहि। चित्त खगेस राम कर समुझि परइ कहु काहि॥ १९ (ग) ॥

अर्थ:

हे गरुड़जी! श्रीरामजी का चित्त वज्र से भी अत्यन्त कठोर और फूल से भी अत्यन्त कोमल है। तब कहिये, वह किसकी समझ में आ सकता है?

दोहा 20 के अंतर्गत
चौपाई

पुनि कृपाल लियो बोलि निषादा। दीन्हे भूषन बसन प्रसादा॥ जाहु भवन मम सुमिरन करेहू। मन क्रम बचन धर्म अनुसरेहू॥ १ ॥

अर्थ:

फिर कृपालु श्रीरामजी ने निषादराज को बुला लिया और उसे भूषण, वस्त्र प्रसाद में दिये। [फिर कहा—] अब तुम भी घर जाओ, वहाँ मेरा स्मरण करते रहना और मन, वचन तथा कर्म से धर्म के अनुसार चलना।

चौपाई

तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता। सदा रहेहु पुर आवत जाता॥ बचन सुनत उपजा सुख भारी। परेउ चरन भरि लोचन बारी॥ २ ॥

अर्थ:

तुम मेरे सखा हो और भरत के समान भ्राता हो। अयोध्या में सदा आते-जाते रहना। यह वचन सुनते ही उसे भारी सुख उत्पन्न हुआ। नेत्रों में [आनन्द और प्रेम के आँसुओं का] जल भरकर वह चरणों में गिर पड़ा।

चौपाई

चरन नलिन उर धरि गृह आवा। प्रभु सुभाउ परिजनन्हि सुनावा॥ रघुपति चरित देखि पुरबासी। पुनि पुनि कहहिं धन्य सुखरासी॥ ३ ॥

अर्थ:

फिर भगवान् के चरणकमलों को हृदय में रखकर वह घर आया और आकर अपने कुटुम्बियों को उसने प्रभु का स्वभाव सुनाया। श्रीरघुनाथजी का यह चरित्र देखकर अवधपुरवासी बार-बार कहते हैं कि सुख की राशि श्रीरामचन्द्रजी धन्य हैं।