नभ दुंदुभीं बाजहिं बिपुल गंधर्ब किंनर
नभ दुंदुभीं बाजहिं बिपुल गंधर्ब किंनर
छन्द १, दोहा १२ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
छन्द पाठ
नभ दुंदुभीं बाजहिं बिपुल गंधर्ब किंनर गावहीं। नाचहिं अपछरा बृंद परमानंद सुर मुनि पावहीं॥ भरतादि अनुज बिभीषनांगद हनुमदादि समेत ते। गहें छत्र चामर ब्यजन धनु असि चर्म सक्ति बिराजते॥ १ ॥
अर्थ
आकाश में बहुत-से नगाड़े बज रहे हैं। गन्धर्व और किन्नर गा रहे हैं। अप्सराओं के झुंड नाच रहे हैं। देवता और मुनि परमानन्द प्राप्त कर रहे हैं। भरतादि अनुज, विभीषण, अंगद, हनुमान आदि समेत छत्र, चँवर, पंखा, धनुष, तलवार, ढाल और शक्ति लिये हुए सुशोभित हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “राम राज्याभिषेक और स्तुति” प्रकरण का छन्द १, दोहा १२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम के दिव्य राज्याभिषेक और वेद तथा शिवजी द्वारा प्रभु की स्तुति का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
राम राज्याभिषेक और स्तुति