गुन सील कृपा परमायतनं
गुन सील कृपा परमायतनं
छन्द १०, दोहा १४ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
छन्द पाठ
गुन सील कृपा परमायतनं। प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं॥ रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं। महिपाल बिलोकय दीनजनं॥ १० ॥
अर्थ
आप गुण, शील और कृपा के परम स्थान हैं। आप लक्ष्मीपति हैं, मैं आपको निरन्तर प्रणाम करता हूँ। हे रघुनन्दन! [आप जन्म-मरण, सुख-दुःख, राग-द्वेषादि] द्वन्द्व-समूहों का नाश कीजिये। हे पृथ्वी की पालना करनेवाले राजन्! इस दीन जन की ओर भी दृष्टि डालिये।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “राम राज्याभिषेक और स्तुति” प्रकरण का छन्द १०, दोहा १४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम के दिव्य राज्याभिषेक और वेद तथा शिवजी द्वारा प्रभु की स्तुति का वर्णन है।
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राम राज्याभिषेक और स्तुति