जय राम रमारमनं समनं
जय राम रमारमनं समनं
छन्द १, दोहा १४ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
छन्द पाठ
जय राम रमारमनं समनं। भवताप भयाकुल पाहि जनं॥ अवधेस सुरेस रमेस बिभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो॥ १ ॥
अर्थ
हे राम! हे रमारमण (लक्ष्मीकान्त)! हे जन्म-मरण के संताप का नाश करनेवाले! आपकी जय हो; भवताप और भय से व्याकुल इस सेवक की रक्षा कीजिये। हे अवधपति! हे देवताओं के स्वामी! हे रमापति! हे विभो! मैं शरणागत आपसे यही माँगता हूँ कि हे प्रभो! मेरी रक्षा कीजिये।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “राम राज्याभिषेक और स्तुति” प्रकरण का छन्द १, दोहा १४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम के दिव्य राज्याभिषेक और वेद तथा शिवजी द्वारा प्रभु की स्तुति का वर्णन है।
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राम राज्याभिषेक और स्तुति