नहिं राग न लोभ न मान

छन्द ७, दोहा १४ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

छन्द पाठ

नहिं राग न लोभ न मान मदा। तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा॥ एहि ते तव सेवक होत मुदा। मुनि त्यागत जोग भरोस सदा॥ ७ ॥

अर्थ

उनमें न राग (आसक्ति) है, न लोभ; न मान है, न मद। उनके लिये सम्पत्ति (सुख) और विपत्ति (दुःख) समान है। इसी से मुनि लोग योग (साधन) का भरोसा सदा के लिये त्याग देते हैं और प्रसन्नता के साथ आपके सेवक बन जाते हैं।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “राम राज्याभिषेक और स्तुति” प्रकरण का छन्द ७, दोहा १४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम के दिव्य राज्याभिषेक और वेद तथा शिवजी द्वारा प्रभु की स्तुति का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
राम राज्याभिषेक और स्तुति