तव बिषम माया बस सुरासुर नाग

छन्द २, दोहा १३ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

छन्द पाठ

तव बिषम माया बस सुरासुर नाग नर अग जग हरे। भव पंथ भ्रमत अमित दिवस निसि काल कर्म गुननि भरे॥ जे नाथ करि करुना बिलोके त्रिबिधि दुख ते निर्बहे। भव खेद छेदन दच्छ हम कहुँ रच्छ राम नमामहे॥ २ ॥

अर्थ

हे हरे! आपकी दुस्तर माया के वशीभूत होने के कारण देवता, राक्षस, नाग, मनुष्य और जड़-जगत सभी काल, कर्म और गुणों से भरे हुए दिन-रात अनन्त भव के मार्ग में भटक रहे हैं। हे नाथ! जिन पर आपने कृपा करके दृष्टि डाली, वे तीनों प्रकार के दुःखों से छूट गये। हे जन्म-मरण के श्रम को नष्ट करने में कुशल श्रीरामजी! हमारी रक्षा कीजिये। हम आपको नमस्कार करते हैं।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “राम राज्याभिषेक और स्तुति” प्रकरण का छन्द २, दोहा १३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम के दिव्य राज्याभिषेक और वेद तथा शिवजी द्वारा प्रभु की स्तुति का वर्णन है।

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राम राज्याभिषेक और स्तुति