मोर मनोरथु जानहु नीकें

चौपाई २, दोहा २३६ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबही कें॥ कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं। अस कहि चरन गहे बैदेहीं॥ २ ॥

अर्थ

मेरे मनोरथ को आप भलीभाँति जानती हैं; क्योंकि आप सदा सबके हृदय रूपी नगरी में निवास करती हैं। इसी कारण मैंने उसे प्रकट नहीं किया। ऐसा कहकर जानकीजी ने उनके चरण पकड़ लिये।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “सीता का पार्वती पूजन, राम-लक्ष्मण संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २३६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी का पार्वती पूजन, वरदान-प्राप्ति और राम-लक्ष्मण के मधुर संवाद का वर्णन है।

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सीता का पार्वती पूजन, राम-लक्ष्मण संवाद