प्राची दिसि ससि उयउ सुहावा
प्राची दिसि ससि उयउ सुहावा
चौपाई ४, दोहा २३७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
प्राची दिसि ससि उयउ सुहावा। सिय मुख सरिस देखि सुखु पावा॥ बहुरि बिचारु कीन्ह मन माहीं। सीय बदन सम हिमकर नाहीं॥ ४ ॥
अर्थ
[उधर] पूर्व दिशा में सुन्दर चन्द्रमा उदय हुआ। श्रीरामचन्द्रजी ने उसे सीता के मुख के समान देखकर सुख पाया। फिर मन में विचार किया कि यह चन्द्रमा सीताजी के मुख के समान नहीं है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “सीता का पार्वती पूजन, राम-लक्ष्मण संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २३७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी का पार्वती पूजन, वरदान-प्राप्ति और राम-लक्ष्मण के मधुर संवाद का वर्णन है।
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सीता का पार्वती पूजन, राम-लक्ष्मण संवाद