जनमु सिंधु पुनि बंधु बिषु दिन
जनमु सिंधु पुनि बंधु बिषु दिन
दोहा २३७ · बालकाण्ड
दोहा पाठ
जनमु सिंधु पुनि बंधु बिषु दिन मलीन सकलंक। सिय मुख समता पाव किमि चंदु बापुरो रंक॥ २३७ ॥
अर्थ
खारे समुद्र में तो इसका जन्म, फिर [उसी समुद्र से उत्पन्न होने के कारण] विष इसका भाई; दिन में यह मलिन (शोभाहीन, निस्तेज) रहता है, और कलंकित (काले दाग से युक्त) है। बेचारा गरीब चन्द्रमा सीताजी के मुख की बराबरी कैसे पा सकता है?
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “सीता का पार्वती पूजन, राम-लक्ष्मण संवाद” प्रकरण का दोहा २३७ है। इस प्रकरण में सीताजी का पार्वती पूजन, वरदान-प्राप्ति और राम-लक्ष्मण के मधुर संवाद का वर्णन है।
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सीता का पार्वती पूजन, राम-लक्ष्मण संवाद