घटइ बढ़इ बिरहिनि दुखदाई
घटइ बढ़इ बिरहिनि दुखदाई
चौपाई १, दोहा २३८ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
घटइ बढ़इ बिरहिनि दुखदाई। ग्रसइ राहु निज संधिहिं पाई॥ कोक सोकप्रद पंकज द्रोही। अवगुन बहुत चंद्रमा तोही॥ १ ॥
अर्थ
फिर यह घटता-बढ़ता है और विरहिणी स्त्रियों को दुःख देनेवाला है; राहु अपनी सन्धि में पाकर इसे ग्रस लेता है। चकवे को [चकवी के वियोग का] शोक देनेवाला और कमल का वैरी (उसे मुरझा देनेवाला) है। हे चन्द्रमा! तुझमें बहुत-से अवगुण हैं [जो सीताजी में नहीं हैं]।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “सीता का पार्वती पूजन, राम-लक्ष्मण संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २३८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी का पार्वती पूजन, वरदान-प्राप्ति और राम-लक्ष्मण के मधुर संवाद का वर्णन है।
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सीता का पार्वती पूजन, राम-लक्ष्मण संवाद