परम प्रेम तिन्ह कर प्रभु देखा

चौपाई २, दोहा १७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

परम प्रेम तिन्ह कर प्रभु देखा। कहा बिबिधि बिधि ग्यान बिसेषा॥ प्रभु सन्मुख कछु कहन न पारहिं। पुनि पुनि चरन सरोज निहारहिं॥ २ ॥

अर्थ

प्रभु ने उनका अत्यन्त प्रेम देखा, [तब] उन्हें अनेकों प्रकार से विशेष ज्ञान का उपदेश दिया। प्रभु के सम्मुख वे कुछ कह नहीं सकते। बार-बार प्रभु के चरणकमलों को देखते हैं।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “वानरों की और निषाद की विदाई” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा वानरों और निषाद की प्रेमपूर्ण विदाई एवं आलिंगन का वर्णन है।

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वानरों की और निषाद की विदाई