चरन नलिन उर धरि गृह आवा

चौपाई ३, दोहा २० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

चरन नलिन उर धरि गृह आवा। प्रभु सुभाउ परिजनन्हि सुनावा॥ रघुपति चरित देखि पुरबासी। पुनि पुनि कहहिं धन्य सुखरासी॥ ३ ॥

अर्थ

फिर भगवान् के चरणकमलों को हृदय में रखकर वह घर आया और आकर अपने कुटुम्बियों को उसने प्रभु का स्वभाव सुनाया। श्रीरघुनाथजी का यह चरित्र देखकर अवधपुरवासी बार-बार कहते हैं कि सुख की राशि श्रीरामचन्द्रजी धन्य हैं।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “वानरों की और निषाद की विदाई” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा वानरों और निषाद की प्रेमपूर्ण विदाई एवं आलिंगन का वर्णन है।

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वानरों की और निषाद की विदाई