तब अंगद उठि नाइ सिरु सजल

दोहा १७ (ख) · उत्तरकाण्ड

दोहा पाठ

तब अंगद उठि नाइ सिरु सजल नयन कर जोरि। अति बिनीत बोलेउ बचन मनहुँ प्रेम रस बोरि॥ १७ (ख) ॥

अर्थ

तब अंगद उठकर सिर नवाकर, नेत्रों में जल भरकर और हाथ जोड़कर अत्यन्त विनम्र तथा मानो प्रेम के रस में डुबोये हुए (मधुर) वचन बोले।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “वानरों की और निषाद की विदाई” प्रकरण का दोहा १७ (ख) है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा वानरों और निषाद की प्रेमपूर्ण विदाई एवं आलिंगन का वर्णन है।

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वानरों की और निषाद की विदाई