परम प्रीति समीप बैठारे
परम प्रीति समीप बैठारे
चौपाई २, दोहा १६ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
परम प्रीति समीप बैठारे। भगत सुखद मृदु बचन उचारे॥ तुम्ह अति कीन्हि मोरि सेवकाई। मुख पर केहि बिधि करौं बड़ाई॥ २ ॥
अर्थ
बड़े ही प्रेम से श्रीरामजी ने उनको अपने पास बैठाया और भक्तों को सुख देनेवाले कोमल वचन कहे—तुम लोगों ने मेरी बड़ी सेवा की है। मुँह पर किस प्रकार तुम्हारी बड़ाई करूँ?
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “वानरों की और निषाद की विदाई” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा वानरों और निषाद की प्रेमपूर्ण विदाई एवं आलिंगन का वर्णन है।
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वानरों की और निषाद की विदाई