सुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो

चौपाई १, दोहा १८ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

सुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो। दीन दयाकर आरत बंधो॥ मरती बेर नाथ मोहि बाली। गयउ तुम्हारेहि कोंछें घाली॥ १ ॥

अर्थ

हे सर्वज्ञ! हे कृपा और सुख के समुद्र! हे दीन दयाकर! हे आर्तों के बन्धु! सुनिये। हे नाथ! मरते समय मेरा पिता बालि मुझे आपकी ही गोद में डाल गया था।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “वानरों की और निषाद की विदाई” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा वानरों और निषाद की प्रेमपूर्ण विदाई एवं आलिंगन का वर्णन है।

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वानरों की और निषाद की विदाई