सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना

चौपाई ४, दोहा १६ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना। मृषा न कहउँ मोर यह बाना॥ सब कें प्रिय सेवक यह नीती। मोरें अधिक दास पर प्रीती॥ ४ ॥

अर्थ

ये सभी मुझे प्रिय हैं, परंतु तुम्हारे समान नहीं। मैं झूठ नहीं कहता, यह मेरा स्वभाव है। सेवक सभी को प्यारे लगते हैं, यह नीति (नियम) है। [पर] मेरा तो दास पर [स्वाभाविक ही] विशेष प्रेम है।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “वानरों की और निषाद की विदाई” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा वानरों और निषाद की प्रेमपूर्ण विदाई एवं आलिंगन का वर्णन है।

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वानरों की और निषाद की विदाई