तुम्हहि बिचारि कहहु नरनाहा
तुम्हहि बिचारि कहहु नरनाहा
चौपाई ३, दोहा १८ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
तुम्हहि बिचारि कहहु नरनाहा। प्रभु तजि भवन काज मम काहा॥ बालक ग्यान बुद्धि बल हीना। राखहु सरन नाथ जन दीना॥ ३ ॥
अर्थ
हे महाराज! आप ही विचारकर कहिये, प्रभु को छोड़कर घर में मेरा क्या काम है? हे नाथ! इस ज्ञान, बुद्धि और बल से हीन बालक तथा दीन सेवक को शरण में रखिये।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “वानरों की और निषाद की विदाई” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा वानरों और निषाद की प्रेमपूर्ण विदाई एवं आलिंगन का वर्णन है।
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वानरों की और निषाद की विदाई