प्रभु प्रेरित लछिमन पहिराए

चौपाई ४, दोहा १७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

प्रभु प्रेरित लछिमन पहिराए। लंकापति रघुपति मन भाए॥ अंगद बैठ रहा नहिं डोला। प्रीति देखि प्रभु ताहि न बोला॥ ४ ॥

अर्थ

फिर प्रभु की प्रेरणा से लक्ष्मणजी ने लंकापति को गहने-कपड़े पहनाये, जो श्रीरघुनाथजी के मन को बहुत ही अच्छे लगे। अंगद बैठे ही रहे, वे अपनी जगह से हिलते तक नहीं। उनका उत्कट प्रेम देखकर प्रभु ने उनको नहीं बुलाया।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “वानरों की और निषाद की विदाई” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा वानरों और निषाद की प्रेमपूर्ण विदाई एवं आलिंगन का वर्णन है।

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वानरों की और निषाद की विदाई