कुलिसहु चाहि कठोर अति कोमल कुसुमहु
कुलिसहु चाहि कठोर अति कोमल कुसुमहु
दोहा १९ (ग) · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
कुलिसहु चाहि कठोर अति कोमल कुसुमहु चाहि। चित्त खगेस राम कर समुझि परइ कहु काहि॥ १९ (ग) ॥
अर्थ
हे गरुड़जी! श्रीरामजी का चित्त वज्र से भी अत्यन्त कठोर और फूल से भी अत्यन्त कोमल है। तब कहिये, वह किसकी समझ में आ सकता है?
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “वानरों की और निषाद की विदाई” प्रकरण का दोहा १९ (ग) है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा वानरों और निषाद की प्रेमपूर्ण विदाई एवं आलिंगन का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
वानरों की और निषाद की विदाई