बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं
बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं
चौपाई १, दोहा १६ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं। जिमि परद्रोह संत मन माहीं॥ तब रघुपति सब सखा बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिरु नाए॥ १ ॥
अर्थ
उन लोगों को अपने घर भूल ही गये। [जाग्रत की तो बात ही क्या] उन्हें स्वप्न में भी घर की सुध (याद) नहीं आती, जैसे संतों के मन में दूसरों से द्रोह करने की बात कभी नहीं आती। तब श्रीरघुनाथजी ने सब सखाओं को बुलाया। सब ने आकर आदरसहित सिर नवाया।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “वानरों की और निषाद की विदाई” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा वानरों और निषाद की प्रेमपूर्ण विदाई एवं आलिंगन का वर्णन है।
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वानरों की और निषाद की विदाई