तब सुग्रीव चरन गहि नाना

चौपाई ४, दोहा १९ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

तब सुग्रीव चरन गहि नाना। भाँति बिनय कीन्हे हनुमाना॥ दिन दस करि रघुपति पद सेवा। पुनि तव चरन देखिहउँ देवा॥ ४ ॥

अर्थ

तब हनुमानजी ने सुग्रीव के चरण पकड़कर अनेक प्रकार से विनती की और कहा—हे देव! दस दिन श्रीरघुनाथजी की चरण-सेवा करके फिर मैं आकर आपके चरणों के दर्शन करूँगा।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “वानरों की और निषाद की विदाई” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा वानरों और निषाद की प्रेमपूर्ण विदाई एवं आलिंगन का वर्णन है।

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वानरों की और निषाद की विदाई