सुनि प्रभु बचन मगन सब भए
सुनि प्रभु बचन मगन सब भए
चौपाई १, दोहा १७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। को हम कहाँ बिसरि तन गए॥ एकटक रहे जोरि कर आगे। सकहिं न कछु कहि अति अनुरागे॥ १ ॥
अर्थ
प्रभु के वचन सुनकर सब-के-सब प्रेममग्न हो गये। हम कौन हैं और कहाँ हैं? यह देह की सुध भी भूल गयी। वे प्रभु के सामने हाथ जोड़कर टकटकी लगाये देखते ही रह गये। अत्यन्त प्रेम के कारण कुछ कह नहीं सकते।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “वानरों की और निषाद की विदाई” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा वानरों और निषाद की प्रेमपूर्ण विदाई एवं आलिंगन का वर्णन है।
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वानरों की और निषाद की विदाई