तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता

चौपाई २, दोहा २० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता। सदा रहेहु पुर आवत जाता॥ बचन सुनत उपजा सुख भारी। परेउ चरन भरि लोचन बारी॥ २ ॥

अर्थ

तुम मेरे सखा हो और भरत के समान भ्राता हो। अयोध्या में सदा आते-जाते रहना। यह वचन सुनते ही उसे भारी सुख उत्पन्न हुआ। नेत्रों में [आनन्द और प्रेम के आँसुओं का] जल भरकर वह चरणों में गिर पड़ा।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “वानरों की और निषाद की विदाई” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा वानरों और निषाद की प्रेमपूर्ण विदाई एवं आलिंगन का वर्णन है।

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वानरों की और निषाद की विदाई