नीचि टहल गृह कै सब करिहउँ

चौपाई ४, दोहा १८ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

नीचि टहल गृह कै सब करिहउँ। पद पंकज बिलोकि भव तरिहउँ॥ अस कहि चरन परेउ प्रभु पाही। अब जनि नाथ कहहु गृह जाही॥ ४ ॥

अर्थ

मैं घर की सब नीची-से-नीची सेवा करूँगा और आपके चरणकमलों को देख-देखकर भवसागर से तर जाऊँगा। ऐसा कहकर वे प्रभु के चरणों में गिर पड़े और बोले—हे नाथ! अब यह न कहिये कि तू घर जा।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “वानरों की और निषाद की विदाई” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा वानरों और निषाद की प्रेमपूर्ण विदाई एवं आलिंगन का वर्णन है।

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वानरों की और निषाद की विदाई