ताते मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे
ताते मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे
चौपाई ३, दोहा १६ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
ताते मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे। मम हित लागि भवन सुख त्यागे॥ अनुज राज संपति बैदेही। देह गेह परिवार सनेही॥ ३ ॥
अर्थ
मेरे हित के लिये तुम लोगों ने घरों को तथा सब प्रकार के सुखों को त्याग दिया। इससे तुम मुझे अत्यन्त ही प्रिय लग रहे हो। छोटे भाई, राज्य, सम्पत्ति, जानकी, देह, गेह, परिवार, स्नेहीजन—
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “वानरों की और निषाद की विदाई” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा वानरों और निषाद की प्रेमपूर्ण विदाई एवं आलिंगन का वर्णन है।
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वानरों की और निषाद की विदाई