पुनि कृपाल लियो बोलि निषादा

चौपाई १, दोहा २० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

पुनि कृपाल लियो बोलि निषादा। दीन्हे भूषन बसन प्रसादा॥ जाहु भवन मम सुमिरन करेहू। मन क्रम बचन धर्म अनुसरेहू॥ १ ॥

अर्थ

फिर कृपालु श्रीरामजी ने निषादराज को बुला लिया और उसे भूषण, वस्त्र प्रसाद में दिये। [फिर कहा—] अब तुम भी घर जाओ, वहाँ मेरा स्मरण करते रहना और मन, वचन तथा कर्म से धर्म के अनुसार चलना।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “वानरों की और निषाद की विदाई” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा वानरों और निषाद की प्रेमपूर्ण विदाई एवं आलिंगन का वर्णन है।

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वानरों की और निषाद की विदाई